पंचांग

आज हम वैदिक ज्योतिष के उस आधार स्तंभ को समझेंगे जिसके बिना समय की गणना और मुहूर्त का विचार असंभव है। इसे हम पंचांग कहते हैं। सरल शब्दों में कहें तो पंचांग वह मानचित्र है जो हमें बताता है कि आकाश में ग्रह और नक्षत्र किस स्थिति में हैं और उनका हमारे जीवन पर क्या प्रभाव पड़ने वाला है।

पंचांग क्या है?

‘पंचांग’ शब्द दो शब्दों के मेल से बना है— पंच (पाँच) और अंग (हिस्से)। जिस प्रकार हमारे शरीर के विभिन्न अंग मिलकर कार्य करते हैं, उसी प्रकार काल या समय को शुद्ध रूप से मापने के लिए इन पाँच अंगों का ज्ञान होना आवश्यक है।

उद्देश्य और महत्व: पंचांग का मुख्य उद्देश्य शुभ कार्यों के लिए सही समय (मुहूर्त) का चयन करना और हमारे दैनिक जीवन की ऊर्जा को ब्रह्मांड की ऊर्जा के साथ जोड़ना है।

पंचांग के पाँच अंग

आकाश में सूर्य और चन्द्रमा की गति के आधार पर समय को पाँच भागों में विभाजित किया गया है:

  1. तिथि
  2. वार
  3. करण
  4. योग
  5. नक्षत्र

तिथि

तिथि क्या है और कैसे बनती है?

तिथि चन्द्रमा की एक दिन की गति को कहते हैं। ब्रह्मांड के चक्र (360 अंश) में जब चन्द्रमा और सूर्य के बीच की दूरी 12 अंश (Degrees) बढ़ जाती है, तो एक तिथि का निर्माण होता है।

शुक्ल पक्ष एवं कृष्ण पक्ष

एक चन्द्र मास में 30 तिथियाँ होती हैं, जिन्हें दो पक्षों में बाँटा गया है:

  • शुक्ल पक्ष: अमावस्या के बाद जब चन्द्रमा बढ़ता है (15 तिथियाँ)।
  • कृष्ण पक्ष: पूर्णिमा के बाद जब चन्द्रमा घटता है (15 तिथियाँ)।
तिथियों का वर्गीकरण और याद रखने की ट्रिक

ज्योतिष शास्त्र में तिथियों को उनकी प्रकृति के अनुसार पाँच वर्गों में बाँटा गया है। इसे याद रखने के लिए एक रोचक कहानी और सारणी नीचे दी गई है:

सारणी: तिथियों का वर्गीकरण

वर्गतिथियाँ (दोनों पक्षों की)स्वभाव
नन्दा 1, 6, 11प्रसन्नता और आनंद देने वाली
भद्रा 2, 7, 12कल्याणकारी और शुभ कार्य हेतु*
जया 3, 8, 13विजय और सफलता दिलाने वाली
रिक्ता 4, 9, 14खाली हाथ (शुभ कार्यों के लिए वर्जित)
पूर्णा 5, 10, 15/30पूर्णता और समृद्धि प्रदान करने वाली

मेमोरी ट्रिक (याद रखने की कहानी): “नन्दा बहन जी रिक्शे पर पहुँची”

  • नन्दा = नन्दा
  • बहन = भद्रा
  • जी = जया
  • रिक्शे = रिक्ता
  • पहुँची = पूर्णा
सूर्योदय नियम, क्षय और वृद्धि
  • सूर्योदय नियम: सूर्योदय के समय जो तिथि उदित होती है, उसे ही पूरे दिन की तिथि माना जाता है, भले ही वह कुछ मिनटों बाद समाप्त क्यों न हो जाए।
  • तिथि क्षय: जब कोई तिथि एक सूर्योदय के बाद शुरू होकर अगले सूर्योदय से पहले ही समाप्त हो जाए, तो उसे ‘तिथि क्षय’ कहते हैं। यह शुभ कार्यों के लिए त्याज्य है।
  • तिथि वृद्धि: जब कोई तिथि एक सूर्योदय से पहले शुरू हो और अगले सूर्योदय के बाद तक रहे, तो उसे ‘तिथि वृद्धि’ कहते हैं। यह भी शुभ कार्यों के लिए त्याज्य है।

मुख्य बातें (Key Takeaways):

  • तिथि सूर्य और चन्द्रमा के 12 अंश के अंतर से बनती है।
  • रिक्ता तिथियों (4, 9, 14) में महत्वपूर्ण शुभ कार्य नहीं करने चाहिए।
  • *भद्रा के बारे में कहा जाता है कि उसका बुरा असर वहीं पड़ता है जहाँ वह निवास करती है | जब चंद्रमा कर्क, सिंह, कुम्भ व मीन राशि में गोचर कर रहा होता है तब भद्रा पृथ्वी पर निवास करती है | उस समय शुभ कार्यों के लिए भद्रा का त्याग करना चाहिए |

वार

वार क्या है?

एक सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक के समय को ‘वार’ कहते हैं। सप्ताह में सात वार होते हैं और प्रत्येक वार का अपना एक स्वामी ग्रह होता है।

सारणी: सात वार एवं उनके स्वामी

वारस्वामी ग्रह
रविवारसूर्य
सोमवारचन्द्र
मंगलवारमंगल
बुधवारबुध
बृहस्पतिवारबृहस्पति (गुरु)
शुक्रवारशुक्र
शनिवारशनि
होरा क्या है और कैसे बनती है?

एक दिन (24 घंटे) को 24 समान भागों में बाँटा गया है, जिसे ‘होरा’ कहते हैं। दिन की पहली होरा उस वार के स्वामी की होती है।

होरा याद रखने की ट्रिक: आकाश में ग्रहों की कक्षा के अनुसार यह क्रम याद रखें: सूर्य → शुक्र → बुध → चन्द्र → शनि → गुरु → मंगल। जिस वार की पहली होरा देखनी हो, वहीं से गिनती शुरू करें। हर वार के स्वामी की होरा के बाद उस वार से छठे वार के स्वामी की होरा आती है जैसे रविवार से 6 गिनो तो शुक्रवार आता है तो सूर्य के बाद शुक्र की होरा |

वारों की उत्पत्ति (होरा चक्र)

24वीं होरा के बाद जो 25वीं होरा आती है, वही अगले दिन का वार तय करती है। यही कारण है कि रविवार के बाद हमेशा सोमवार और शनिवार के बाद रविवार आता है। वार की गणना सूर्योदय से होती है। रविवार को सूर्योदय के समय पहली होरा सूर्य की होगी | सोमवार को सूर्योदय के समय पहली होरा चंद्र की होगी | इसी प्रकार होरा निश्चित करें |

करण (Karana)

करण क्या है और कैसे बनते हैं?

एक तिथि के दो आधे भाग को ‘करण’ कहते हैं। अतः एक चन्द्र मास की 30 तिथियों में कुल 60 करण होते हैं।

करणों का वर्गीकरण

कुल 11 करण होते हैं, जिन्हें दो श्रेणियों में बाँटा गया है:

  1. चर (7 करण): जो बार-बार चक्र में आते हैं।
  2. स्थिर (4 करण): जो महीने में केवल एक बार आते हैं।

सारणी: करणों का क्रम

प्रकारकरण के नाम
चर करणबव, बालव, कौलव, तैतिल, गर, वणिज, विष्टि (भद्रा)
स्थिर करणशकुनि, चतुष्पद, नाग, किंस्तुघ्न

विशेष नियम:

  • शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा का पहला आधा भाग हमेशा किंस्तुघ्न करण होता है।
  • कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी का दूसरा भाग शकुनि, अमावस्या के दो भाग चतुष्पद एवं नाग होते हैं।

मुख्य बातें (Key Takeaways):

  • करण तिथि का आधा भाग है।
  • विष्टि (भद्रा) करण को शुभ कार्यों के लिए टालना चाहिए।

योग

योग क्या है?

सूर्य और चन्द्रमा के स्पष्ट अंशों (Longitude) के योग से बनने वाली स्थिति को ‘योग’ कहते हैं। कुल 27 योग होते हैं।

सारणी: 27 योगों के समूह

समूहयोग के नाम
प्रथम 9विष्कुम्भ, प्रीति, आयुष्मान, सौभाग्य, शोभन, अतिगण्ड, सुकर्मा, धृति, शूल
द्वितीय 9गण्ड, वृद्धि, ध्रुव, व्याघात, हर्षण, वज्र, सिद्धि, व्यतीपात, वरीयान
अंतिम 9परिघ, शिव, सिद्ध, साध्य, शुभ, शुक्ल, ब्रह्म, ऐन्द्र, वैधृति
महत्व: मुहूर्त शास्त्र में कुछ योगों को बहुत शुभ (जैसे सिद्धि, सौभाग्य) और कुछ को अशुभ (जैसे व्यतीपात, वैधृति) माना गया है।

नक्षत्र

नक्षत्र क्या है?

आकाश मंडल को 27 समान भागों में विभाजित किया गया है, जिन्हें नक्षत्र कहते हैं। प्रत्येक नक्षत्र का अपना स्वामी और विशिष्ट स्वभाव होता है।

सारणी: नक्षत्र समूह एवं स्वामी

क्रमनक्षत्र समूहस्वामी ग्रह
1अश्विनी, मघा, मूलकेतु
2भरणी, पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ाशुक्र
3कृत्तिका, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़ासूर्य
4रोहिणी, हस्त, श्रवणचन्द्र
5मृगशीर्ष, चित्रा, धनिष्ठामंगल
6आर्द्रा, स्वाती, शतभिषाराहु
7पुनर्वसु, विशाखा, पूर्वाभाद्रपदगुरु
8पुष्य, अनुराधा, उत्तराभाद्रपदशनि
9आश्लेषा, ज्येष्ठा, रेवतीबुध

अध्याय का सार

पंचांग समय की वह सूक्ष्म इकाई है जो तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण के माध्यम से ब्रह्मांडीय ऊर्जा का विवरण देती है। तिथि मन की स्थिति, वार शरीर की शक्ति, नक्षत्र प्राण ऊर्जा, योग स्वास्थ्य और करण सफलता का प्रतिनिधित्व करते हैं।

अभ्यास प्रश्न (10 MCQ)

  1. पंचांग के कितने अंग होते हैं?

(क) 4 (ख) 5 (ग) 7

  • नन्दा तिथि किस क्रम में आती है?

 (क) 1, 6, 11 (ख) 2, 7, 12 (ग) 4, 9, 14

  • रिक्ता तिथियाँ कौन सी हैं?

(क) 1, 6, 11 (ख) 4, 9, 14 (ग) 5, 10, 15

  • सूर्य और चन्द्रमा के बीच कितने अंश का अंतर एक तिथि बनाता है?

 (क) 10 (ख) 12 (ग) 15

  • सप्ताह में कितने वार होते हैं?

 (क) 5 (ख) 7 (ग) 9

  • एक दिन में कितनी होरा होती हैं?

 (क) 12 (ख) 24 (ग) 60

  • कुल कितने करण होते हैं?

 (क) 7 (ख) 11 (ग) 27

  • स्थिर करणों की संख्या कितनी है?

 (क) 4 (ख) 7 (ग) 11

  • कुल कितने नक्षत्र होते हैं?

(क) 12 (ख) 27 (ग) 30

पुष्य नक्षत्र का स्वामी कौन है?

  1. (क) सूर्य (ख) चन्द्र (ग) शनि

महत्वपूर्ण प्रश्न

  1. पंचांग की परिभाषा लिखते हुए इसके अंगों का महत्व समझाइए।
  2. तिथि क्षय और तिथि वृद्धि में क्या अंतर है? उदाहरण सहित स्पष्ट करें।
  3. होरा चक्र के माध्यम से वारों की उत्पत्ति कैसे होती है? समझाइए।

Revision Notes (Quick Revision)

  • तिथि: 12° का अंतर, 30 तिथियाँ, नन्दा से पूर्णा तक वर्गीकरण।
  • वार: 7 दिन, सूर्योदय से गणना, पहली होरा वार का स्वामी।
  • करण: तिथि का आधा भाग, 11 कुल (7 चर, 4 स्थिर)।
  • योग: सूर्य + चन्द्रमा, कुल 27।
  • नक्षत्र: 27 विभाग, प्रत्येक के स्वामी ग्रह निश्चित हैं।

अस्वीकरण (Disclaimer)

यह लेख केवल शैक्षणिक और सामान्य जानकारी के उद्देश्य से लिखा गया है। ज्योतिष एक विश्वास-आधारित विषय है। किसी महत्वपूर्ण निर्णय के लिए योग्य विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य लें।

सूचना

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